सपने अभी काफी है............./

आज कुछ ऐसा हुआ, जैसे किसी ने मेरे अंतर्मन को छुआ, आई एक ठंडी बयार, मन को दे गयी खुमार. कल्पना की ऊँची उड़ान, छूने लगी क्षितिज आसमान. मन को लगा मंजिल यही है, जिंदगी की खुशिया यही से जुडी है. सारे सपने उसी के आने लगे, अंतर्मन के तरंगो पर छाने लगे. हवाओ में उसी की खुशबू है, खिली-खिली धूप पर भी उसी का जादू है. ऊफ ये कैसी तूफान, जिसमे सब ख़त्म करने की उफान. नहीं ये तो एक मंजर है, जो देता अपना होने का वहम है. कहा यहाँ अपना है कोई, जिसकी तलाश में पूरी रात ना सोई. सफ़र तो अभी बाकी है, सपने अभी काफी है............./