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Friday, July 14, 2017

ये ज़िन्दगी गले लगा जा ......

हर पल ..हर लम्हे में है जिन्दगी... ऐसा सुना है, ...और देखा भी है .. पर  ये ज़िन्दगी है क्या? क्या सांसो का लेना और जिन्दा रहना जिन्दगी है .. तो फिर आपने क्या नया कर लिया ये तो सबने सुना और देखा ही है ...
आप सोचो और खुद से पूछो!
" जिन्दगी मात्र सांसो को लेना या जिन्दा रहना नहीं बल्कि जिन्दगी यानि "आप".
आपका हँसना  -रोना,   इच्छा - चाहत, सोच - विश्वास, कर्म- अपेक्षा, आपके   मनोभाव, सुख- दुःख का एहसास, सब से मिल कर बनती है जिन्दगी. और ये जिन्दगी मात्र आपकी होती है .. किसी और से न बनती है और न ही बिगड़ सकती है..ये  आपके साथ हर हाल में रहती है , आप किसी भी हालात या हालत में हो आपकी जिन्दगी सदैव आपके साथ रहती है . .और आपका सदैव साथ देती है..
जो चीज उसे दोंगे ठीक वैसा ही दुगना कर  आपको वापस करेगी ..
अब आप के उपर है उसका साथ कैसे लेते है...और उसे अपना साथ कैसे देते है..
सकारात्मक .. हसते ..गुनगुनाते ..और विश्वास के साथ
या
फिर किसी और तरह ..

गुनगुनाओ एक बार मुस्करा के
ये जिन्दगी गले लगा ले  ...$ $ $ $ $ 

Wednesday, July 29, 2015

manjil aur safa

Khol do bandhno ko ...

खोल दो सारे बंधनो को ..
मन के घोड़े पे सवार
इच्छाओ को मुक्त आकाश में उड़ने  दो ..

कभी कभी आसमा को छूकर जमी पे गिरना अच्छा लगता है ..
इस गिरने में आसमा और धरती की दूरी एहसास होता है  ..

मिलना तो वैसे भी एक दिन मिटटी में है ..
क्यों न उड़  कर ही मिले..
 न जाने इस उड़ान में बदलो की कुछ बून्द भी समां जाये .
और जब मिटटी में मिले तो सोधि खुशबू  आजाये ..
जो अक्सर लोग को  बरबस खीच लेती है ..

हर लम्हा,  हर वो  ख्वाहिशे जीने के लिए है ,,
जो हम अक्सर खुली आँखों से देखते है..

खोलो तो सही ..
बंधनो के धागो को ..
काटने से .. गिरने से क्यों डरते हो ..
जीना इसी धरती पे है ..
गिरना भी इसी धरती पे है ..

तो फिर क्यों न ख्वाहिशो की उड़ान भर कर ..
बदलो के कुछ बून्द चुरा कर, गिरे
उसका मजा ही कुछ और है ...

टूटना बिखरा भी मन का ही खेल है ..
 तो फिर खेल को पूरा खेल कर ही क्यों न जाये ...

खोल दो सारे बंधनो को ..
मन के घोड़े पे सवार
इच्छाओ को मुक्त आकाश में उड़ने  दो ..

Monday, June 10, 2013

चिंता समृद्ध भारत की , सोच एक सुशिक्षित एवं विकसित भारत की. प्रयास एक हरे- भरे ओ संपन्न देश की. पैर कैसे ? इस कैसे का उत्तर खोजने के लिए बड़ी - बड़ी संगोष्ठिया , बुध्दिजीवियो की परिचर्चा, योजना आयोग का अनुसधान, और फिर उसे क्रियान्वित करने का भी प्रयास . हम जब भी भारत की बात करते है तो मानस पटल पर जो प्रतिबिम्ब आती hai  वो ग्रामीण   भारत की आती है जिनकी जनसँख्या जनx.kuk २०११ के अनुसार १२१ है और इसमें ८३-३ करोड़ लोग ग्रामीण भारत से है -
किसी भी देश का सच्चा विकास तभी संभव है जब उसका अंतिम व्यक्ति विकसित  हो, उसका चेहरा भयरहित और भूखरहित हो. और भारत का अंतिम व्यक्ति गावो में बसता है और यही हमारे  राष्ट्रपिता गाँधी जी का अन्त्योद्वाद का सपना है .
गौर करने की बात है गावं में बहने वाले भारत के विकास की परिकल्पना बिना ग्राम के कर ली जाती है. जबकि भारत तभी विक्सित होगा जब भारत के ६ लाख ग्राम विक्सित होंगे. आज हालत ये है की गावो में बिजली की तार और मोबाईल की घंटी घर घर पहुच गए है पर घाव के घर बिराने हो रहे है, क्यों की उनके पास आय के साधन नहीं है. उन्हें अपने जीवन को बनाये रखने के लिए शहर के तरफ मजबूरी उन्मुख होना पर रहा है. हमारा ग्राम सदैव से प्राकृतिक संपदा से भरपूर रहा है, और देश की आर्थिक जरूरतों को भी किसान अपने खेतो से पूरा करता रहा है फिर क्या कारण है की बापू का 'ग्राम स्वराज्य'  का सपना स्वतंत्रता के ६३ वर्षो बाद भी सपना ही बना हुआ है.
जितना पुराना 'भारत' का इतिहास है उतना ही पुराना 'भारतीय ग्राम' . जहा भारतीय नगरी से सभ्यता का विकास होता रहा वाही भारतीय ग्राम के  कृषि व् पशुपालन से  सम्पूर्ण समाज के जीवन यापन की मुलभुत आवश्यकता को पूरा करता रहा है. वैदिक कल में ग्राम और गो समृध्दी व् श्रेष्ठता का प्रतिक थी. ग्राम सदैव से भारतीय समाज रोपी गाड़ी  का एक पहिया रहा है और भारत की जो भी आर्थिक व् सामाजिक सभ्यता रही है वो ग्राम से हो कर गुजरती है. यहाँ की संस्कृति, सभ्यता और आदर्श आज भी ग्रामीण जीवन में सुरक्षित है. 
जहा तक आर्थिक पक्ष की बात है तो इसकी धुरी ग्रामीण भारत ही है. कृषि भारत का मुख्य आर्थिक पक्ष है, और यहाँ की ७० % जनता का जीवन कृषि पर ही निर्भर है . राष्ट्रिय आय का ५१% भारतीय ग्राम से ही आता है . हैण्डलूम   और जूट की खूबसूरती विदेशो में बिकती है वही चीनी और गुड की मिठास मुह में घुलती है इन सुब के लिए हम भारतीय ग्राम पर ही निर्भर है. भारत लोकतंत्र देश है और लोकतंत्र में जहा एक एक वोट की महत्ता होती है वही हमें देश की ८० % वोट गावो से आता है.
इस सारे रुपहले और सुनहरे पक्ष के साथ जो यथार्थ भारतीय ग्राम का है वो अभी भी अँधेरा है . भारत के विकास की जो चर्चा विश्वपटल पर हो रही है वो अभी भी  अधूरी है क्यों की आज भी हमारा ग्रामीण भारत में शिक्षा , स्वस्थ , कुपोषण की समस्या बनी हुई है . आज जो इस देश के किसान जो ग्राम का सिपाही है वो आत्महत्या कर रहा है . पाठशाला में बच्चे पहुच गए पर शिक्षक आज भी नहीं है. अस्पताल बन गए पर डॉक्टर का रूम खली है. पानी की पाइप चला गया पर पानी अभी भी स्वच्छ नहीं है. वहा आज भी किसान पुरे वर्ष मेहनत करता है फिर भी अपने जीवन को सामान्य स्तर तक नहीं ले जा पातेऔर ना ही उसे अपना भविष्य सुरक्षित नजर आता है. उसके फसलो की बोली सरकार व दलाल लगते है और वो अपने खुली आँखों से अपने आप को बिकता हुआ देखता है और इसे अपनी किस्मत समझ इसे स्वीकार करता है.
ऐसा नहीं है की भारत की सरकार को अपने ग्राम की और ग्रामीण लोगो की महता पता नहीं है. स्वतंत्रता उपरांत गाँधी के सपनो का भारत जिसकी शुरुआत ग्रामीण स्वावलंबन में  थी उसे प्राप्त करने के लिए  प्रथम पांचवर्षीय योजना से ही प्रयासरत रही है.
भारत सरकार की कुछ महत्वा पूर्ण योजनाये -

निर्भय हो लड़ते है है,

यह अरण्य जुरमुट जो कटे,
अपनी रह बना ले,
क्रित- दस यह नहीं किसी का ,
जो चाहे अपना ले,
जीवन उसका नहीं युधिस्ठिर,
जो इससे डरते है,
यह उनका जो चरणरोप,
निर्भय हो लड़ते है है,

Wednesday, January 18, 2012

कमिटमेंट जीवन के साथ

अक्सर  सुना है लोग बदल जाते है, वक्त के साथ,
मुझे भी यही लगता था की लोग बदल जाते है..
पर जैसे-जैसे जिंदगी को जी रही हू,
वैसे वैसे लग रहा है लोग नहीं बल्कि जिंदगी नया रूप देती है,
नया नजरिया देती है, 
जीने के लिए, लोगो को जानने के लिए!
इसलिए लोग बदले नजर आते है!
लोग पहले से ही ऐसे ही थे  और है !
बस आपका परिचय अभी हुआ है!  
हा इसी से जिंदगी का नयापन हमेशा बना रहता है.
हर मोड़ पे एक नया  रूप. नयी पहचान खुद की और लोगो की.  
इधर बिच कुछ नए रूप से पहचान हुई, हा ये परिचय मेरे जीवन में  पहला परिचय था..
पर ये बहुत ही खुबसूरत परिचय है. जिंदगी से कमिटमेंट हो रहा है ...
इसके बाद सब  बदल गया  क्यों की कमिटमेंट जो बदल गयी थी.. 
(पहले कमिटमेंट लोगो से थी अब लाइफ से है .. जिंदगी के हर पह्लू से है ...इसे इसके उदेश्य को जानना है और इसको पाना है)
एक मजे की बात जब से मुझे जिंदगी को देखने की आदत लगी ( जसकी आदत मुझे मेरे जिंदगी में साथ देने वालो  ने करवाई)
मुझे इसका नशा सा हो गया है. क्यों की हर पल एक नया परिचय..
उफ़ ये बहुत ही खुबसूरत है! हा ये प्रक्रिया  कठिन है  पर सच्ची मानिये  परिणाम बड़े ही खुबसूरत! मन को सदैव  चन्दन सी शांति देने वाला है ..




Thursday, March 24, 2011

"चुस्की ले तो मनवा फेंटास्टिक हो जाये "



सुबह उठते  ही  अपने  पसंद के काच के ग्लास में अदरख वाली चाय मिल जाये ...
और उसे भजन के साथ चुस्की ले कर पी जाये , फिर पेड़ो को पानी दे सूरज के साथ आख मिचौली न कर लो तब तक न सासों में ताजगी ना पुरे दिन के लिए जीवन रस.
बड़ा नीरस सा लगता है दिन जैसे सुखी काठ जिसमे  कोई रस ही नहीं  और रस नहीं तो स्वाद कैसा ?
इधर बीच इसकी  महत्ता का पता चला! पता क्या चला मै कहने-सुनने में वो भी जिंदगी के रस के मामले में ज्यादा  विश्वास  नहीं करती जब तक मै खुद ना अनुभूत कर लू.
आप कह सकते हो ये मेरे में बहुत बड़ा लोचा है! पर क्या कर सकते है! कुछ भी नहीं!
मै खुद लाचार हू.. क्यों की कई बार सुधरवादी आन्दोलन में मुझे भी मेरे अपनों ने सुधारने की  बड़ी कोशिश की पर असफल हो जाते है..!
पर एक  बड़े राज की बात बताती हू इसमें अपना ही मजा है - सोमरस जैसा !
हमेशा ताजा तरीन बने रहने का एहसास... नए स्वाद का एहसास..!
आपके रस स्वाद का विस्तार होता है !
जब आप अपने आप को जीते है तो आप दो रस का स्वाद लेते हो -
१-एक तो उसपर चलने की प्रक्रिया का स्वाद जो आप ही चख सकते हो !
२- दुसरे उस पर चलने के बाद परिणाम के मिलाने का स्वाद...!
और ये दोनों ही  मीठा और कड़वा  हो सकता है!
         पर विश्वास मानिये जबरदस्त नया स्वाद जो कही भी किसी को  नहीं मिल सकती, ये सिर्फ आपको मिल सकती है...!

पर क्या करे बचपन में ही हमें कूट कूट के सिखा दिया गया की ये अच्छा  है ये बुरा है....और यही पर गड़बड़  हो गयी !
क्यों की हर कोई मीठे के सूझ बुझ में ना जाने कितने अनमोल स्वाद से महरूम हो गया !  
पूरे जीवन को नाप तौल के बठ्करे में डाल के मीठे के चक्कर  में ना जाने कितने रस का बिना स्वाद के ही जीवन को खत्म कर दिया !
पर आप जीवन को रसहिन् नहीं रस से लबालब कर सकते है ! 

"चुस्की ले तो मनवा फेंटास्टिक हो जाये "

नोट - कृपया चुस्की लेने के पहले  प्रयोग ( प्री-टेस्ट  ) करके  जरुर देखे! क्यों की ये आप को एलर्जी भी कर सकता है ! 










Thursday, March 10, 2011

तेरी प्रभुताई तो तभी जचती है जब तू भी मुझे अपने दिल में रखता !!!!!

कल कबीर को सुन रही थी याद आया गुजरा जमाना कि कैसे ये मेरे में उतर गए और मुझमे ही मिल गए !


कबीर तुलसी और सूरदास इन तीनो को बचपन से पढती आरही थी पर इनको १०वी कक्षा से समझना शुरू किया था और ग्रेजुएट होते होते इनमे रमने लगी थी !

कबीर तो मेरे जीवन के मार्ग दर्शक बन गए. कितनी अजीब बात है बिना आडम्बर के महाराज और महिमामंडित गुरु देव की पाखंड से दूर बिना गुरु दक्षिणा  लिये ...लाग-लपट रहित, छल-छ्दम से परे जीवन का रस  दे गये!

तुलसीदास जी मुझे थोड़ा कम  ही रमते, पहले भी आज भी ! इसलिए नहीं की उनकी महत्ता कम है!

कबीर की दोहावली और सूर के पद इक्के - दुक्के घरो में ही मिलेंगे पर ' राम चरित मानस' तुलसी दास जी की रचना घर घर में मिलेगी ! मेरे पास भी है ! उसके कुछ दोहे गाने मुझे भी पसंद है !

पर यहाँ बात महनता की नहीं है बात यहाँ भाव की है!
तुलसीदास जी ने दास भाव से अपनी भक्ति को रखा है और इसलिए मुझे वो भाव जचता ही नहीं और रमने की बात में सूरदास जी बाजी मार गए ! क्यों की सूर की भक्ति भाव सखा है!

कैसा छोटे बड़े का भेद ?
तुम भगवान तो मै भक्त ! भक्त के बिना भागवान कैसा ?

अधिकार भाव ! कैसे नहीं मानोगे !

तुम सुन सकते हो तो सुनो नहीं तो मै चली !

मेरी बदनामी नहीं होगी पर तेरे लघुताई की हंसी जरुर होगी !

तेरे पीठ पीछे तेरे लघुताई के वैसे भी खूब चर्चे है और लोग चठ्कारे ले कर स्वाद लेते है !!!

मुझे क्या है मै तो भक्त हू कही भी भजन  कर  लूंगी ! कही भी रम गयी !

तुह्मी यशोदा माँ को नहीं कह सकते मै भी तुह्मे कह सकती हू " यह लो अपनी लकुटी कमरिया बहुत ही नाच नचायो" !

तुझे भोग लगाने वाले हजारो है पर तुह्मे भी पता है कि हजारो में मै ही एक मात्र हू जिसके दिल में तू रहता है, बिना किसी भय के !

हजारो तो तुझे प्रभु मान तेरे प्रभुताई से डरते है और तू ही बता  कही भय से भी प्रीति होती है !

ना बाबा ना ये तो मेरे से नहीं होगा ! ये मेरे लिए मुश्किल ही नहीं असम्भव है !

देख लो तुह्मे अगर बिना भेद-भाव के प्रीति अच्छी लगती है तो बोलो नहीं तो मै चली !

मुझे क्या तुम तो मेरे दिल में बंद हो जहा चाहूंगी-जब चाहूंगी तुममे रम लूँगी !

मेरे जाने के बाद तुह्मी तड़पोगे.. पछ्तावोगे !

पर कहा ये भी होगा तुमसे, तुमने मुझे अपने दिल में थोड़े ही  रखा है !!!!

तेरी प्रभुताई तो तभी जचती है जब तू भी मुझे अपने दिल में रखता !!!!!





Tuesday, February 1, 2011

दिल तो बच्चा है जी!!!!!


दिल को सहारा  चाहिए
मन को किनारा!!


दिल सहारे में डूब मुस्कराता है
मन किनारे के लिए जाल बिछाता है!


दिल की दुनिया अपनी होती है
मन की तो ठोक-ठाक  के  बसाई जाती है !



दिल जानता भी नहीं क्या अच्छा है क्या बुरा
मन हर बार तौलता है क्या और कितना भला ! 

दिल का तार  धरकन से जुड़ा
मन तो  मस्तिस्क के  उलझन में पड़ा  !

दिल में खोये  तो........ आप किसी के और आपका कोई हो गया
मन में खोये तो औरो का  क्या.... आप ही अपने ना हुए ! 


दिल जब भी धड़का तो  दुआए निकली है .. जो अक्सर दूसरो से ही जुड़ी है
मन जब भी दौड़ा  तो  तमन्नाये निकलती है ..... जो अक्सर अपने सुख से जुड़ी होती है !


दिल का सब  गवा ...उफ़ ना किया
मन का गया तो उसमे घाव बन गया !

हे प्रिये मैंने तुझे दिल से और तुने मुझे मन से जोड़ा
इसलिए तू मुझसे दूर हो कर भी है मुझ में ही छुपा  !
और मेरे दिल के तरानों  से है बंधा !

तू मत तौल मेरे दिल को अपने मन के भार  से
जब भी तौलेगा  मेरा दिल जमी को ही छुएगा !!!!!

विनीता सिंह
                     सम्पादक - आपका सारथि